नाना नहीं रहे : अभिनय की वो आग बुझ गई, जिसने किरदारों में जान फूंकी
Nana Patekar Death : 1 जनवरी 1951 को मुरुड-जंजीरा, महाराष्ट्र में जन्मे नाना पाटेकर ने 1978 की ‘गमन’ से फिल्मी सफर शुरू किया और 2026 की ‘सुबहदार’ तक करीब पांच दशक के सिनेमा सफर में तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री सहित कई सम्मान हासिल किए.

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सूर्योदय के साथ ही सिनेमा जगत का एक शानदार सितारा हमेशा के लिए अस्त हो गया. यह सिर्फ एक खबर नहीं बल्कि सिनेमा से जुड़े लोगों के साथ ही करोड़ों चाहने वालों के लिए हैरान करने वाली खबर हैं.नाना पाटेकर गोवा के डोना पाउला स्थित अपने घर में कार्डियक अरेस्ट आने की वजह से बेहोश पाए गए थे.उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया,जहां लगभग 45 मिनट तक डॉक्टरों की टीम ने कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन के जरिए नाना को बचाने की हरसंभव कोशिश की मगर शरीर में कोई हलचल न होने पर डॉक्टरों ने 5.20 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया.
किसानों के मसीहा: नाम फाउंडेशन
नाना पाटेकर सिर्फ एक अभिनेता नहीं बल्कि एक संवेदनशील इंसान भी थे. बर्ष 2015-2016 में जब महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के किसान भीषण सूखे और कर्ज की वजह से आत्महत्या करने को मजबूर थे बल्कि ज़मीनी हकीकत में भी एक सच्चे नायक की तरह अपने मित्र मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘ नाम फाउंडेशन ‘ की नींव रखी.
नाम फाउंडेशन के जरिए Nana Patekar ने सूखे की समस्या से निपटने के लिए नदियों, नालों, तालाबों का गहरीकरण और चौड़ीकरण करना जिससे जल संचयन हो सके. इसके अलावा किसानों को ड्रिप सिंचाई प्रणाली और मिट्टी परीक्षण मशीनें उपलब्ध कराई गईं. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, खाद्य सुरक्षा एवं आजीविका के साधनों को बढ़ावा दिया गया. इस फाउंडेशन के जरिए नाना पाटेकर ने सूखे एवं कर्ज से जूझ रहे किसानों को आर्थिक मदद प्रदान किया. नाना एक ऐसे दरियादिल इंसान थे, जो अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा समाजहित में समर्पित कर देते थे.
नाना पाटेकर का पांच दशकों का सिनेमाई सफर
1 जनवरी 1951 को जन्मे नाना पाटेकर ने अपने अभिनय की शुरुआत मराठी थियेटर से की थी. 1978 में निर्देशक मुजफ्फर अली की फिल्म ‘गमन ‘ से उन्होंने हिंदी सिनेमा में कदम रखा और फिल्म ‘ परिंदा ‘ में निभाए उनके किरदार डॉन ‘ अन्ना सेठ ‘ से उन्हें रातों – रात एक नई पहचान मिला. इस शानदार अभिनय के लिए नाना पाटेकर को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला.
फिल्म ‘ परिंदा ‘ से जहाँ नाना को पहचान मिली, वहीं 1994 में आई फिल्म ‘ क्रांतिवीर ‘ ने Nana Patekar को शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा दिया. इस फिल्म के संवाद आज भी दर्शकों के दिलों को छू जाते है. फिल्म क्रांतिवीर के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के साथ ही फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला. फिल्म ‘ अग्नि साक्षी ‘ के लिए उन्हें फिर से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
लगभग पांच दशकों तक भारतीय सिनेमा के माध्यम से दर्शकों का मनोरंजन करने वाले नाना पाटेकर आज हमारे बीच भले न हो लेकिन उनके द्वारा निभाए गए किरदारों के माध्यम से हमेशा अमर रहेंगे. उनके द्वारा निभाए गए यादगार किरदारों को उंगलियों पर नहीं गिना जा सकता,जिससे यह साबित होता है कि नाना संजीदा और गंभीर किरदारों में जितना लाजवाब थे, कॉमेडी और पारिवारिक ड्रामा में उनका कोई सानी नहीं था.
2016 में महेश मांजरेकर द्वारा निर्देशित मराठी फिल्म ‘ नटसम्राट ‘ में नाना द्वारा निभाया गया किरदार ‘ गणपतराव बेलवलकर ‘ अपने आप में एक ‘अभिनय की पाठशाला ‘ है. जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंचे एक रंगकर्मी की लाचारी और गरिमा को उन्होंने जिस संजीदगी से पर्दे पर उतरा, जिसने हर दर्शक की आँखें नम कर दी थीं.
2013 में भारत सरकार ने Nana Patekar के कला, समाजसेवा और संस्कृति में अप्रतिम योगदान को देखते हुए ‘ पद्मश्री ‘ सम्मान से सम्मानित किया. नाना पाटेकर का जाना अत्यंत दुःखद है. उनके निर्भीक व बेबाक विचार, दमदार संवाद और समाज के प्रति उनका समर्पण हमेशा पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा.
” भावभीनी श्रद्धांजलि. शत शत नमन “
